मेरे प्रिय गुरु जी स्वर्गीय डा. राकेश गुप्ता

                              मेरे प्रिय गुरु जी  स्वर्गीय  डा. राकेश गुप्ता


शिक्षा पाने के लिए मैं किसी का मोहताज़ नहीं होता 
आप नहीं होते इस जहां मे तो मुझे इस शिक्षा का एहसास नहीं होता ।
 
        
  ईश्वर से मांगता हूँ दुआ हर तरफ आप ही को पाऊँ 
मैं आप को देख  हर मंजिल  मे सफल हो जाऊँ 
ये मुमकिन नहीं होगा कि मैं आपको भूल जाऊँ  

कितनी भी मुश्किले आ जाए चाहे मेरे सामने 
दुआ है आप से मेरी , सूरत हो आपकी सिर्फ मेरे सामने
मुश्किले आसान बन जाएगी 
आंखे जब मेरी आपकी सूरत देख पाएगी 

स्वर्ग मानता हूँ आपके चरणों मे मैं अपना 
पल -पल शिक्षा मिले आपसे यही मेरा सपना 

ईश्वर से मांगता हूँ दुआ सर झुकाये 
हर कोई आप जैसे गुरु को पाये 
मंजिल चाहे कितनी भी कठिन हो जाए 
सफल हो जाएगी वो कठिन मंजिल 
मेरे सर पर अगर आपका हाथ आ जाए  

मैं इम्तिहान मैदान मे जब भी उतर जाऊँ 
दुआ हैं ईश्वर से सामने बस आप ही को पाऊँ 

माँ - बाप से ऊंचा दर्जा आपको मिला हैं 
माँ - बाप ने तो जीवन दिया हैं 
मगर जीने का मकसद मुझे आप से मिला हैं  

मैं अपने जीवन मे चाहे कुछ भी कर जाऊँ 
आपने बताई हर बात को अपने मन मे बिठाऊँ 
आपकी दिखाई रहो पर मैं चलू ओर सफल हो जाऊँ 

मैं चाहे किसी भी मुकाम पर पहुँच जाऊँ 
पर ऐसा न होगा कि मैं आपको भूल जाऊँ । 



 
डा. राकेश गुप्ता 


गुरु कि महिमा का बखान हमारे महाकवियों ने भी किया है गुरु पर आधारित कुछ प्रचलित दोहे और उनके अर्थ इस प्रकार से है :-

गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय ।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय ॥

   अर्थ – अपने इस प्रचलित दोहे में महाकवि कबीरदास जी कहते है कि जब आपके सामने गुरु और भगवान दोनों ही खड़े हो तो आप सर्वप्रथम किसे प्रणाम करेंगे? गुरु ही आपको गोविंग अर्थात भगवान तक पंहुचने का मार्ग प्रशस्त करता है अर्थात गुरु महान है और आपको अपने गुरु का ही वंदन सर्वप्रथम करना चाहिए.

पिता जन्म देता महज, कच्ची माटी होय |
गुरुजनों के शिल्प से, मिट्टी मूरत होय ||

अर्थ :- अपने इस दोहे में कवि कहते है जब पिता बालक को जन्म देकर अस्तित्व मे लाता है तो वह कच्ची मिट्टी के समान होता है अर्थात उसमें कोई गुण दोष नहीं होते वो जीवन पथ से अंजान होता है. उसके बाद जब वह अपने गुरु के संपर्क में आता है तो शिक्षक उसके गुणो को तराश कर उसे एक मूर्ति कि भाति तैयार करता है जिससे वह अपना भविष्य बना सकें और समाज में अपना जीवन यापन कर सकें.

गीली मिट्टी अनगढ़ी, हमको गुरुवर जान,
ज्ञान प्रकाशित कीजिए, आप समर्थ बलवान।

अर्थ :- अपने इस दोहे में कवि कहते है कि हें गुरुवर आप हमे कच्ची मिट्टी कि भाति जानकर हमें भविष्य के लिए तैयार कीजिये. आप ही ऐसे व्यक्ति है जो हमारे गुणो अवगुणो कि परिकल्पना कर हममे ज्ञान रूपी दीपक प्रज्वलित कर सकते है.

गुरु बिन ज्ञान न होत है, गुरु बिन दिशा अजान,
गुरु बिन इन्द्रिय न सधें, गुरु बिन बढ़े न शान।

अर्थ :- अपने इस दोहे में कवि कहते है गुरु के बिना ज्ञान पाना मुश्किल है, गुरु के बिना शिष्य अपनी दिशा का ज्ञान भी नहीं प्राप्त कर सकता. गुरु के बिना विध्यार्थी का अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण भी मुश्किल है और इन सब के बिना उसका समाज में कोई स्थान नहीं.

शिष्य वही जो सीख ले, गुरु का ज्ञान अगाध,
भक्तिभाव मन में रखे, चलता चले अबाध।

अर्थ :- अपने इस दोहे में कवि कहते है शिष्य वही है जो गुरु द्वारा दिया ज्ञान अपने अंदर अर्जित करले और अपने मन में अपने गुरु के प्रति श्रध्दा रखकर अपने कर्म पथ पर आगे बढ़ता चले. 



                                                        Athlete Chand Singh Rohilla




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